Tuesday, January 31, 2017

अधूरी रहने दो.

मेले से किसी  मुट्ठी मे बंद 
लौट आए सिक्के की तरह,
या ताश के खेल में आख़िर तक,
नाकाम किसी इक्के की तरह,
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.


वहाँ जहाँ बस उड़ाने बात करती है,
उस वीरान मकान की तरह,
और जिसके कई लफ्ज़ उर्दू से लगते हो,
ऐसी किसी ज़बान की तरह.
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.

भरी बरसात मे सूखे रह गये
 छत के  उस कोने की तरह,
या बरसो चली k बंद घड़ी मे 
आख़िर मे बजे पौने की तरह.
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.

एक मासूम कलम से टेढ़ी-मेडी
खीची किसी लकीर की तरह,
या किसी चबूतरे पे औंधे मुह लेटे
उस अधमरे फकीर की तरह
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.


आधे चाँद को सीने से लगाए 
उंघते, उस आसमान की तरह !
और हां वो कभी कभी ठीक लिख लेता है,
ऐसी किसी पहचान की तरह
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.

वहां जहाँ  तुम और मैं अक्सर बिछड़ जाते है
ऐसे किसी जहान की तरह,
और उम्मीद की ड्योढ़ी से अब तक झाकते
किसी दिल-ए-नादान की तरह
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.



Friday, October 7, 2016

आपके हिस्से की कविता

आपके हिस्से की कविता,
होगी तो ज़रूर कहीं!


मुमकिन है घिस गयी होगी

आपके जूते के सोल की तरह,
जिसने मंज़िले तो बहुत तय की,
पर अपने वजूद की कीमत पर!


या घुल गयी उस मुस्कुराहट मे

जो खिली होगी किसी को
दूर जाता देख कर
पहली बार साइकल की पेडेल मारते.


या बिसरा दी गयी होगी

गणित के किसी सवाल मे,
ईकाई और दहाई के बीच
फँसे हुए हाँसिल की तरह.


या फिर गुम गयी होगी

उस थरथरती रात की अंधियारी मे ,
जब रज़ाई से बिना सर बाहर निकले,
विदा किया था नाइट शिफ्ट क लिए.


या दबी होगी सबसे नीचे

किसी सब्जी के थैले मे
जिसपर किचन से आवाज़ आई होगी कि
जाने किस उम्र मे सीखेंगे ये सब्जी खरीदना.


या फिर थमी रह गयी होगी

उस कलम की निब पर
जिसकी स्याही निपट गयी हो,
माँ महबूब और मिट्टी पे लिखते लिखते.


या फँसा हुआ हो, कहीं भीतर

उन्ही चट्टानी परतों के बीच
जहाँ आपके जीवन भर का संघर्ष,
बरसों में दबे दबे अब हौसला बन गया है!

कहीं तो ज़रूर होगी, पापा,
आपके हिस्से की कविता.
जो लाख पुकारे जाने पर भी
आवाज़ नही देती ,
सामने नही आती,
बस महसूस होती है
हर जगह , हर पल,
GRAVITY की तरह.


खामोश होकर भी असरदार होने का हुनर

यक़ीनन इसने आपसे ही सीखा होगा.

Saturday, March 5, 2016

दुआ

एक अजनबी शहर की किसी वीरान स्टेशन पर,
बड़े विशाल छत के नीचे बैठा,
एक सूक्ष्म इंसान,
जो उस अंजानेपन को मिटने में लगा हो,
जिसे आती जाती निगाहों ने,
खीच दी है उसकी
ललाट पर।
और इतने मे,
कोई धीरे धीरे आकर लग जाता है
प्लेटफार्म पे
बिना शोर किये,
और पल भर में,
आती हुई किसी हॉर्न की आवाज पर
साइड दे देता है
 आने वाली  local ट्रेन को,


ट्रेन क दरवाजे की धक्का मुक्की में,
वो सूक्ष्म होने वाला एहसास कहीं
प्लेटफार्म पर ही दौड़ता रह जाता है ,
ट्रेन की गेट पर पर खड़े,
अजीब चेहरों की परछाइयों मे
हाथ बटुआ टटोल लेता है
और ठंडी हवा जिस्म,
और इमारतों की खिड़कियों से
घूरती रौशनी के दरम्यान,
अगले स्टेशन पर,
पड़ोस में खड़ा सुकून
उतर जाता है कंधे पर धक्का देकर,
earphone पर पीकू वाला 'बेजबान' गाना
रात की तरह ढलता चला जाता है|

पर वो अभी भी साथ है।
पर वो है कौन?
जिस्म ?
तो आखे क्यों नहीं फारकती उसकी,
उसने हाथ क्यों नहीं बढ़ाया अब तक।
रूह?
होती क्या है वो?
न देखी  कभी,न महसूस किया कभी.
खुदा?
उसकी तरह निराकार तो है,
पर मगर मुझे लगता है वो ,
उस बिलखते बच्चे को चुप करने गया होगा,
जिसकी अम्मा उसे तकिये क पास अकेला बिठाकर 
दूध गरम करने को माचिस ढूंढ रही होगी।

तो ये कौन है जो साथ चल रहा मेरे,
कौन है जो यू ही चलने लगता है संग संग ,
नाम भी नहीं बताता अपना.
मुझे लगता है कोई दुआ है उसकी,
आते वक़्त नाराज़ थी जरा मुझसे ,
बेरुखी से बस 'take care' कहा था उसने !!

Saturday, September 19, 2015

हेडलाइट

तनहा स्याह राहो में ,
अक्सर  ऑन कर लेता हूँ,
और चलता चला जाता हूँ।

कभी कभी उजालों में ,
बेजरूरत भी,
आन रह जाती हो तुम।

यु ही कोई देख लेता है,
और टोंक देता है ,
ऑफ कर लेता हूँ झटके से।

मेरे बाइक की हेडलाइट,
और तेरी खुसनुमा यादें,
कित्ती मिलती जुलती हैं न।



Tuesday, April 14, 2015

बीमार कुत्ता


वो बीमार कुत्ता 
जो दरवाजे के पास,
गोल गोल चक्कर लगाता था, 
शून्य के इर्द-गिर्द!
गिर जाता था,
फिर होश संभाल कर,
घूमने लगता था,
उसे जाना नही था कहीं,
बस यूँ  ही काट देनी थी,
अपनी बची खुची ज़िन्दगी।

आज किसी भीड़ मे जब ,
एक ख्वाब से,
हाथ छुड़ा कर घर आया,
तो बड़ी देर तक जेहन में,
 वो कुत्ता,
गोल गोल घूमता रहा ।

Sunday, March 8, 2015

सोचता हूँ मैं..

कई बार मैं आसमान की तरफ देखता हूँ
और कुछ नही सोचता,
कई बार मैं चाँद को सोचता हूँ
आखें बंद करके,

कई बार जब तुम्हे सोचता हूँ,
तो तुम्हे  देखने लगता हूँ!
और जब देखता हूँ तुम्हे ,
तो सोचने लगता हूँ


कि  देखा जाए तो 
बहोत ज़्यादा फ़र्क नही है
देखने और सोचने मे,
देखने का तरीका है, जी बस!

कि जो देखते हैं , उसे सोच लेते हैं,
और जो सोचते हैं , उसे देख लेते हैं!
उतना ही सोच पाते हैं ,जितना देख पाते हैं
और उतना ही देख पाते हैं, जितना सोच पाते हैं!

बनाने वाले ने फिर 
क्या सोच कर
आँख और अकल 
अलग अलग बनाई होगी?


देखा जाए तो,
इतते बड़े आसमान के नीचे
इतनी बड़ी  है दुनिया,
और कितना कम है
जो हम देख पाते हैं
या सोच पाते हैं

सोचता हूँ मैं कभी कभी, 
के देखने और सोचने का
ये जो सिलसिला नही होता,
जो यकीन नही होता अपनी आखों पर इतना,
और अपने सोचने पे इतना गुमान नही होता ,
तो क्या कुछ और देख पता मैं,
तो क्या कुछ और सोच पाता मैं!

के फिर आसमान देख कर,
 पता नही क्या सोचता?
और चाँद सोचने की,
 कुछ और बात होती.

आप भी सोचिए,
आप भी देखिए सोच कर! 

Tuesday, January 13, 2015

Spoilers Ahead

कभी कभी आपको नही लगता,
के किन अजीब रस्तों पे
चले जा रहा हूँ,
के कोई बुने जा रहा है ,
मैने सुने जा रहा हूँ,
क्योंकि,
जो तलाश है, वो मंज़िल नही,
जो मंज़िल है वहाँ जाना नही,
जो खो दिया है, उसे खोना ना था.
जो हासिल  सा है, उसे पाना नही.
आसमान की तरफ तो देखा होगा,
कभी कभी आपको नही लगता,
के बस ये जमी सरक रही है,
आप रुके से हैं.
Trade mill पे तो चला होगा,
जो एक पाँव आगे निकल जाता है
तो दूजा पीछे,
और हम इसी एहसास से थक जाते हैं 
की बड़ी दूर निकल आए.

खैर मुझे यकीन हैं,
आप भी बूझ गये होंगे,
के ज़िंदगी भी 
 Keyser Söze  वाला खेल  है,
पर रहने दीजिए,
आप Climax का इंतज़ार कर लीजै!